नई दिल्ली। ठीक एक साल पहले 15 जून 2020 को लद्दाख के गलवान घाटी इलाके में भारत और चीन के बीच झड़प में 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। चीन के भी कई सैनिक मारे गए थे। एशिया के दो ताकतवर देशों के बीच ये बीते चार दशकों की सबसे हिंसक सैन्य झड़प थी। विशेषज्ञ कहते हैं कि एक साल बाद गलवान के इलाके की सामरिक स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन भारत के कड़े जवाब के बाद एक साल से चीन गलवान जैसी हरकत नहीं की है।
बीते एक साल में 11 दौर की बातचीत, लेकिन तनाव बरकरार
रक्षा विश्लेषक मानते हैं कि भले ही नई झड़प न हुई है, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव अभी भी बरकरार है। बीते एक साल में दोनों देशों के बीच 11 दौर की वार्ता हो चुकी है। लेकिन, इसका हासिल बहुत ज्यादा नहीं है। चीन अभी भी अपने 1959 के दावे को दोहरा रहा है। भारत इसको स्वीकार नहीं कर सकता है, क्योंकि इसे मानने की स्थिति में भारतीय सेना को कई हिस्सों में पीछे हटना पड़ेगा। ऐसे में सीमा विवाद जहां था, अब भी वहीं है।
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन से जुडे़ सामरिक विशेषज्ञ कार्तिक बूमाकांती कहते हैं कि 'चीन LAC पर डेपसांग प्लेंस, गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स इलाकों में अपनी स्थिति को और मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। यहां चीन ने अपनी आर्टिलरी और एयर डिफेंस स्ट्रेंग्थ को मजबूत किया है। मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर भी मजबूत किया है। ये चीन की तैयारी को दर्शाता है, जिससे भारत को सतर्क रहना जरूरी है।'
कार्तिक कहते हैं, 'भारत के करीब 50 हजार सैनिक LAC पर तैनात हैं। हमने एयर एसेट्स की तैनाती भी बढ़ाई है। ये एक मुश्किल और दुर्गम इलाका है, जिसके लिए सैनिकों का अभ्यस्त होना जरूरी होता है। इसलिए भारत यहां तैनाती में रोटेशन पॉलिसी अपना रहा है, ताकि अधिक से अधिक सैनिकों को यहां के मौसम के हिसाब से तैयार किया जा सके।'
भारत के कड़े जवाब के बाद शांत है चीन
भारत के पूर्व DGMO लेफ्टिनेंट जनरल (रि) विनोद भाटिया कहते हैं, 'गलवान में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत और चीन के बीच कोई झड़प नहीं हुई है। गलवान के बाद दोनों तरफ से किसी भी तरह का एस्केलेशन नहीं हुआ है। गलवान की झड़प के समय युद्ध के हालात बन गए थे। चीन ने गलवान जैसी कई घटनाएं करने की तैयारी कर रखी थी, लेकिन भारत ने चीन को कड़ा जवाब दिया था और उस झड़प में चीन को भी भारी कीमत चुकानी पड़ी थी। यही वजह है कि चीन की तरफ से इसके बाद कोई आक्रामकता नहीं दिखाई गई। 16 जून 2020 के बाद से किसी तरह का एस्केलेशन नहीं हुआ है।'
भारत ने पिछले साल अगस्त में पैंगांग के दक्षिणी तट पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी, लेकिन इस साल फरवरी में भारत और चीन दोनों ने ही आपसी सहमति से पैंगॉग से पीछे हटने फैसला किया था। अभी सिर्फ यही एक इलाका है जहां दोनों तरफ सेनाएं नहीं हैं।
इस समझौते पर कार्तिक कहते हैं, 'समझौते के तहत चीन के साथ भारत को भी यहां से पीछे हटना पड़ा है। यदि भारत यहां मौजूद रहता तो इससे भारत को बढ़त मिलती।'
पैंगांग से सेनाओं के पीछे हटने पर जनरल विनोद भाटिया कहते हैं, 'इसका एक पक्ष ये भी है कि कुछ डीएस्केलेशन भी नहीं हुआ है। पैंगाग झील से जरूर सेनाएं हटी हैं, उसकी वजह ये है कि भारतीय सेना ने कैलाश रिज को अपने कब्जे में ले लिया था और रणनीतिक बढ़त हासिल कर ली थी।'
विवाद की जड़ क्या है?
चीन की सेना ने कई ऐसे इलाकों में अपनी सैन्य तैनाती कर रखी है जो भारत के हैं। यही गलवान जैसे विवादों की जड़ है। भारत भी इन इलाकों की पेट्रोलिंग करता है। ये एक तरह का स्टैंड ऑफ है। यानी दोनों ही देशों की सेनाएं तैनात भी हैं और तैयार भी हैं।
1962 से पहले ही चीन ने भारत के लद्दाख के 78 हजार वर्ग किलोमीटर पर कब्जा कर लिया था। सियाचीन का साढ़े तीन हजार वर्ग किलोमीटर हिस्सा और पाकिस्तान की तरफ से दी गई सक्षम घाटी चीन के कब्जे में है।
चीन और भारत के बीच आपसी समझ लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल है, लेकिन ये सीमा अभी नक्शे पर निर्धारित नहीं है। ये काल्पनिक रेखा है। एक LAC वो है जिसे भारत अपनी सीमा मानता है, एक LAC चीन की है जिसे चीन अपनी सीमा मानता है। ऐसे में तनाव की संभावना हमेशा बनी रहती है।
चीन ने कुछ फॉरवर्ड इलाकों में तैनाती बढ़ाई, लेकिन भारत भी यहां से पीछे नहीं हटा
भारत सरकार का कहना है कि चीन सीमा पर कोई घुसपैठ नहीं हुई है और न ही चीन ने भारत के किसी इलाके पर कब्जा किया है। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन LAC पर कुछ आगे बढ़ा है। पूर्व DGMO जनरल (रि) विनोद भाटिया कहते हैं, 'चीन ने अभी किसी नए इलाके पर कब्जा नहीं किया है, लेकिन फॉरवर्ड एरिया में उसकी सेना की तैनाती की रिपोर्ट हैं। डेपसांग, हॉट स्प्रिंग आदि इलाके में चीन की फॉरवर्ड डिपलायमेंट की रिपोर्टें हैं। लेकिन, भारत भी यहां से पीछे नहीं हटा है।'
विनोद भाटिया कहते हैं, 'अभी भारत और चीन के बीच गतिरोध चल रहा है। चीन भी वहीं है जहां वो जून 2020 में था और भारत भी वहीं है जहां वो था। चीन ने अपनी पॉजीशन को कंसोलिडेट किया है और जवाब में भारत ने भी अपनी तैनाती मजबूत की है। सेना एक बार बढ़त हासिल करने के बाद उसे बरकरार रखने की कोशिश करती ही है।'
चीन सैनिकों की संख्या घटाकर हथियारों में निवेश कर रहा
1980 के दशक में चीन के सैन्य और अर्धसैनिक बलों की संख्या एक करोड़ दस लाख से अधिक थी जो अब 30 लाख के आसपास है। पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी में सैनिकों की संख्या इस दौरान 36 लाख से कम होकर 9 लाख 65 हजार हो गई है। चीन ने अर्धसैनिक बलों की संख्या में भी भारी मात्रा में कटौती की है। विश्लेषक मानते हैं कि चीन सैनिकों के वेतन भत्ते से बचे बजट का इस्तेमाल सेना को मॉर्डन करने और भारी हथियार हासिल करने में कर रहा है। कार्तिक कहते हैं, 'चीन ने अपने सैनिकों की संख्या कम की है और उस पैसे को हथियारों में निवेश किया है। जबकि भारत की सेना का आधे से अधिक बजट वेतन, पेंशन और दूसरे भत्तों में खत्म हो जाता है। भारत के पास दस लाख से अधिक सैनिक हैं, जिनमें से कई डिवीजन काउंटर इंसरजेंसी ऑपरेशन में तैनात हैं।'
जवाब में भारत ने क्या किया है
भारत ने भी चीन की तैयारियों को देखते हुए बॉर्डर एरियाज में सड़कों का निर्माण किया है और अपना इंफ्रास्ट्रक्रचर मजबूत किया है। भारत ने फ्रांस से नए राफेल विमान खरीदे हैं और रूस से एंटी मिसाइल सिस्टम हासिल करने जा रहा है।
कार्तिक कहते हैं, 'भारत सरकार ने सेना को आपात फंड दिए हैं। भारतीय सेना और वायुसेना इस पैसे से अपनी जरूरत के मुताबिक नए हथियार खरीद सकती है। लद्दाख में आर्टिलरी मजबूत करने के साथ एयर डिफेंस एसेट्स तैनात करना अच्छा कदम है।'
विश्लेषक मानते हैं कि 'चीन के पास फायर पॉवर ज्यादा है, इक्विपमेंट अधिक हैं। जबकि, भारत के पास सैनिक ज्यादा हैं। भारत को आर्टिलरी यूनिट, मिसाइल सिस्टम और एयर पॉवर मजबूत करने पर जोर देना चाहिए।'
लेफ्टिनेंट जनरल (रि) विनोद भाटिया भी इससे इत्तेफाक रखते हैं। वे कहते हैं, 'हम ये तो नहीं कहेंगे कि भारत अब वहां चीन से मजबूत स्थिति में है, लेकिन ये जरूर है कि भारत चीन से कमजोर नहीं है। भारत की सबसे बड़ी चुनौती चीन की आक्रामकता का जवाब देना है। इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर बिल्ड करना होगा और अपनी क्षमता को और बढ़ाना होगा।'
क्या भारत और चीन के युद्ध की ओर बढ़ सकते हैं
जनरल विनोद भाटिया कहते हैं, 'भारत की नीति युद्ध की नहीं है। वहीं, चीन भी भारत से युद्ध नहीं चाहता है। चीन ने इन इलाकों में करीब 50 हजार सैनिक तैनात किए हैं। इस इलाके में इतने सैनिकों से लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। जितने सैनिक चीन के है, उतने ही भारत के भी हैं। इससे साफ है कि दोनों ही देश यहां युद्ध नहीं चाहते हैं।'
भाटिया कहते हैं, 'चीन की वैश्विक महत्वकांक्षाए भी अलग हैं। चीन अमेरिका को चुनौती देना चाहता है। यहां तो चीन सिर्फ भारत को रोकने के लिए आया है। चीन यहां भारत को उलझाना चाहता है। हालांकि, इसका मतलब ये नहीं है कि भारत यहां रिलैक्स हो जाए। भारत को अपनी सेना में अधिक निवेश करना होगा और भविष्य के लिए तैयार होना होगा।'